थोड़ा-बहुत मेरे बारे में...
In Her Own Words — Jaya SarkarJaya Sarkar is a distinguished Indian author, poet, playwright, and literary speaker with a career spanning over four decades in Hindi literature.
As the Founder Director of the cultural and theatrical organization Sambhavana, she has made substantial contributions to regional and national arts. Her theatrical plays have been staged at prominent venues, including Mumbai's iconic Prithvi Theatre, and performed internationally in the UAE and USA. She has authored award-winning Hindi poetry and play collections, alongside 18 English coffee table books documenting tourism, regional heritage, and national identity.
क्यों लिखता है कोई कविता? क्योंकि वह संवेदनशील होता है! वो तो बहुत से लोग होते हैं मगर हर कोई तो कविता नहीं लिखता! केवल भाषा की संपन्नता किसी को कवि नहीं बनाती! फिर क्या घटित होता है उसके साथ कि वह अपने आपको शब्दों की इस विधा में अभिव्यक्त कर पाता है। कुछ और होता है, जो समझ नहीं आता!!
"अतीत में जाना कोहरे से भरी पगडंडी पर चलने के समान है। दूर से सब धुंधला-धुंधला सा दिखता है लेकिन जैसे-जैसे कोहरे के भीतर चलते जाओ कुछ दृश्य-परिदृश्य स्पष्ट होने लगते हैं..."
मैं कब और कैसे लिखने लगी? लग रहा है थोड़ा ख़ुद को टटोलूँ मगर अतीत में जाना कोहरे से भरी पगडंडी पर चलने के समान है। दूर से सब धुंधला-धुंधला सा दिखता है लेकिन जैसे-जैसे कोहरे के भीतर चलते जाओ कुछ दृश्य-परिदृश्य, घटनाएं, शहर, मुहल्ला और चेहरे स्पष्ट होने लगते हैं। और कुछ, जीवन भर कोहरे का हिस्सा ही बने रहते हैं! शायद बने रहें तो बेहतर है! इतना समय बीत गया है कि लगता है कि मैं अपने ही गुज़रे हुए जीवन की साक्षी हूँ।
मध्य प्रदेश का एक छोटा सा शहर हुआ करता था- रायपुर। अब वह छत्तीसगढ़ की राजधानी है। वहीं एक महाराष्ट्रीयन परिवार में जन्म हुआ। मेरे बाबा (दादा जी) अपनी शादी के बाद नागपुर से रायपुर आए और वहीं बस गए। मैं अपनी पीढ़ी की पहली संतान थी। आई जब ‘माँ’ बनी थीं, अठारह की भी नहीं हुई थीं। पत्नी तो शायद तब बनी जब दादा (पापा) का transfer इंदौर हुआ। उन दिनों संयुक्त परिवारों में नौजवान बेटे-बहु किसी अनुष्ठान, उत्सव में ही ‘पति-पत्नी’ से प्रतीत होते थे बाकी समय तो दूसरे रिश्ते उन पर इतने हावी होते थे कि पति-पत्नी का रिश्ता ‘डोरमेंट’ सा रहता था।
‘आई’ का कॉलेज में दाख़िला हो गया था मगर शादी का रिश्ता भी आ गया। दोनों परिवारों ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि शादी के बाद पढ़ाई जारी रहेगी। मगर मैं बिन बुलाए मेहमान की तरह आ गई। Literally! 21 सितम्बर दिन में ठीक 12 बजे मेरा जन्म हुआ। मैं गर्भनाल में जकड़ी हुई दुनिया में आई थी! जन्म के तुरंत बाद रोई भी नहीं। उल्टा-पुलटा करके थपाथप मारा गया तब जाकर मेरा रोना शुरू हुआ और जब नाल काटी गई तो पता चला कि घर में लक्ष्मी आई है। लड़की होने को घर में ‘लक्ष्मी’ के आने का शुभ संकेत मानने वाले परिवार से थी इसलिए मेरा आना उत्सव की तरह था।
मेरे जन्म के तुरंत बाद ही बाबा एक गाय ख़रीद कर ले आए। उस समय भी छोटे शहरों में दान में या मन्नत पूरी होने पर गाय भेंट स्वरूप दी जाती थी। उस दिन हमारे परिवार में दो नए सदस्य जुड़े। हमारा नामकरण भी साथ-साथ हुआ। गौ माता का नाम रखा गया- ‘श्यामा’। ‘माँ’ और श्यामा के दूध का ही असर है कि मैं कभी बीमार नहीं पड़ी। हाँ, घुटने, कोहनी और ठुड्डी की चोट एक सूखती तो दूसरी लग जाती! नटखट और शैतान के बीच की थी मैं!
मेरे लिए बचपन जितना रोमांचक और सुखद था उतना ही घर वालों के लिए ख़ासकर मेरी ‘आई’ के लिए चुनौती भरा था। संयुक्त परिवार में एक ‘शरारती’ लड़की का होना माँ पर एक इल्ज़ाम की तरह होता था। बड़े परिवार की बड़ी बहु वाली ज़िम्मेदारी, ऊपर से मेरी जैसी उधमी बेटी क्या करती बेचारी। जीवन की शुरुआत ‘दाई’ की थपाथप से चालू हुई और पूरा बचपन ‘आई’ की धपाधप में बीता! मेरी इमेज भी ऐसी थी कि कहीं कोई सामान टूटता-फूटता, कोई बच्चा रोता- रूठता, गली-मुहल्ले से या स्कूल से शिकायत आती तो बिना सोचे समझे मुझे पहले ‘पड़ जाती’ फिर पूछा जाता कि किसने किया, क्यों किया? जब ये पता चलता कि किसी और का ‘प्रसाद’ मुझे मिला है तो ‘आई’ को पछतावा भी नहीं होता कि बेकार में ही रसीद दिया बेचारी को! मुझे बहलाते हुए कहती, ‘चल अगली बार का एडवांस समझ ले!’
नवरात्र-दीवाली-दशहरा और जन्मदिन को छोड़कर साल भर कभी चपत, कभी थप्पड़ कभी झापड़ और कभी कुटाई होती। ये सब जो ऊपर से एक से लगते हैं, असल में अलग-अलग डिग्री के होते हैं! बदतमीज़, अफलातून, तूफ़ान, शैतान, नौटंकी बाज़, लफंटर, लोफ़र, उपद्रवी- आजकल ये सब कोई नहीं कहता अपने बच्चों को। ‘Naughty’ कहकर ही निपटा लेते हैं! ‘पेरेंटिंग’ अब एक ‘ऐकडेमिक सब्जेक्ट’ हो गया है।
हमारे तो सारे मसले हमारी ‘आई’ सुलझाती थी आजकल ‘AI’ है! माता-पिता की सीखें, सलाहें, नसीहतें, नानी-दादी के नुस्खे, टोटके, किस्से-कहानियाँ सब outdated और करीब-करीब obsolete हो गए हैं। अब बेचारे पेरेंट्स भी बच्चों को डिप्रेशन न हो जाए, anxiety न हो जाए, personality crash ना हो जाए ये सोचकर बहुत प्रेशर में रहते हैं। वे अपने बच्चों को बिल्कुल अलग ढंग से ट्रीट करते हैं। इसलिए अब बचपन भी बदल गया है। बच्चे आँख खुलते ही डिजिटल दुनिया के हो जाते हैं। उस तरह के शरारती नहीं होते। बड़े Sophisticated executive टाइप लगते हैं। मासूमियत भी कम हो गई है।
मेरे तीसरे जन्मदिन में मेरी दो साल की बहन और तीन महीने का भाई भी शामिल था और इस बीच में चाचा की शादी हुई तो दो बहनें और आ गईं थीं। परिवार बढ़ रहा था। ‘आई’ दोनों छोटे भाई-बहनों में और घर के कामों में व्यस्त रहती थी। दिन भर तो किसी तरह निकाल लेती मगर शाम को जब दादा ऑफिस से आते मुझे उनके सुपुर्द कर कहती, ‘इसको तो भई अब तुम संभालो, थोड़ी चैन की साँस की हकदार तो मैं भी हूँ...’
दादा मुझे स्कूटर में बिठाकर आस-पास चक्कर लगाते और छोटा मोटा काम भी निपटा आते। स्कूटर के सामने खड़ी होकर मुझे लगता मैं पूरी दुनिया में सबसे आगे हूँ, सब मेरे पीछे हैं! दादा के साथ ही मैंने जीवन की पहली पिक्चर देखी- ‘नन्हा फरिश्ता’। परिवार के साथ मीना बाज़ार, सर्कस, गणपती और दुर्गा उत्सव के दर्शन और झकियाँ देखने जाना, बगीचे में पिकनिक मनाने जाना, रिश्तेदारों, दोस्तों के घर ‘बैठने’ जाना हमारी outings हुआ करती थी।
थोड़ी बड़ी हुई तो दादा-आई को लगा स्कूल के अलावा मुझे किसी न किसी रचनात्मक काम में व्यस्त करना निहायत ज़रूरी है! कुछ ना कुछ प्रलोभन दिया जाता ‘ये करो तो वो मिलेगा, वो करो तो ये मिलेगा’! मैं ‘कुल्फी’ की लालच में रोज़ ‘गीता प्रेस’ की ‘गीता’ का एक अध्याय ज़ोर-ज़ोर से पढ़ा करती थी। रोज़ शाम को कुल्फी वाला हमारे बड़े से बाड़ेनुमा घर के सामने खड़ा होकर घंटी बजाता और कर्कश सी आवाज़ लगाता ‘ठंडी कुल्फी...मीठी कुल्फी’
उन दिनों ‘फेरी वाले’ मुहल्लों का अहम किरदार होते थे। सबकी अपनी-अपनी unique स्टाइल होती थी। उन्हें मुहल्लों की सारी ख़बर होती थी। सर, मैडम वाले सम्बोधन नहीं होते थे ‘राम राम’ के बाद उम्र और ओहदे के हिसाब से बाबा जी, चाचा जी, भैया जी, भाभी जी, दीदी कहकर बुलाते थे। फेरी वाले, दुकान वाले, पान वाले, रिक्शे वाले, घर में काम करने वाले या भीख मांगने वाले सभी हमारे मुहल्ले और हमारे जीवन का हिस्सा हुआ करते थे।
छोटे भाई-बहनों को पढ़ाने के लिए भी इन्सेनिव मिलता था। दादा ‘भारतीय खाद्य निगम’ में थे। क्लर्क से लेकर अफसर तक का सफर अपनी मेहनत, ईमानदारी और अनुभव से तय किया था। उनका हर तीन साल में ट्रांसफर होता था। मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कोई किसी भी राज्य से आकर बसा हो, कोई भी भाषा बोलता हो, यहाँ रहने के बाद वो अपने आचार, विचार, व्यवहार से ‘मध्यप्रदेशी’ हो जाता है। महराष्ट्रीयन होने के बावजूद मेरी पहली भाषा हिन्दी है। मराठी तो अटकी-भटकी सी रही क्योंकि घर में भी ज़्यादातर हिन्दी ही बोली जाती थी।
परिवार लगातार बढ़ रहा था। दादा को ऑफिस से loan मिला तो उन्होंने एक घर खरीद लिया और हम वहीं शिफ्ट हो गए। दादी का ‘बच्चों की याद आ रही है’ कह कर घर आना-जाना चलता रहा। बाबा का रुतबा और दबदबा भी उतना ही था। छत बदली मगर छत्रछाया वही रही!
हम गर्मी की छुट्टियों में जगन्नाथपूरी गए। मैं 13-14 साल की थी। हम गोयंका धर्मशाला में ठहरे थे। उन दिनों धार्मिक स्थलों में आम लोगों के लिए धर्मशालाएँ हुआ करती थीं। हमारे सामने वाले कमरे में जमशेदपुर से एक बंगाली परिवार आया था। उस परिवार में 18-19 साल का एक आकर्षक, दुबला-पतला, लंबा, स्मार्ट सा लड़का भी था इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था नाम था- आभास सरकार।
"हमारी चार दिन की 'पूरी' यात्रा में 'पूरी जीवन यात्रा' का एक साथी मिल जाएगा, इसका अंदाज़ा भी नहीं था।"
ये वही लड़का है जिसकी वजह से अब मैं ‘वंडलकर’ से ‘सरकार’ हो गई हूँ! हमारी चार दिन की ‘पूरी’ यात्रा में ‘पूरी जीवन यात्रा’ का एक साथी मिल जाएगा, इसका अंदाज़ा भी नहीं था। जैसे दो यात्री परिवारों में मित्रता हो जाती है, वैसे हुई। साथ-साथ जगन्नाथ जी के दर्शन कर आए, घर के पतों का आदान-प्रदान हुआ। आप कहाँ से आयें हैं, क्या करते हैं से शुरू होते-होते लगे हाथ एक दूसरे के परिवारों के सारे रिश्तेदारों के इतिहास और भूगोल की जानकारी भी साझा कर ली गई!
आभास ने कहा, “मैं तुम्हें चिट्ठी लिख सकता है क्या?”
“नहीं, हमारे यहाँ लड़कों-वड़कों की चिट्ठी नहीं आ आती”
“अच्छा, तो तुम्हारा कोई सहेली है जो रायपुर के बाहर रहता है?’
कुछ दिनों तक एक लड़की के नाम से चिट्ठियाँ लिखते रहे। उनकी टूटी-फूटी हिन्दी और मेरी लंगड़ी लूली अंग्रेज़ी के बावजूद हमारी कहानी चल पढ़ी।
आभास ने एक बार चिट्ठी में लिखा ‘तुम्हारा आँख बहुत सुंदर हैं।’ मुझे पहली बार किसी से ऐसा कुछ compliment मिला। पहले तो घर पे यही सुनने को मिलता था कि ‘इस लड़की की बटर-बटर आँखों से ही ख़ुरापात टपकता है!!’ बस फिर क्या था, बार-बार आइना देखना शुरू हो गया। सलीके से रहना, चलना और उठना-बैठना भी!
दिन भर धमा-चौकड़ी करने वाली लड़की को एकांत रास आने लगा। अब भाई-बहनों के साथ घर में बनी पानी की टंकी में कूद-कूद कर नहाना बचकाना लगने लगा। लगने लगा ‘मैं बड़ी हो रही हूँ’। सोचती कि आभास को ये सब लिखूँ... लिखूँ कि रह-रह कर उन्हीं का चेहरा दिखाई देता है। फिर लगता ‘क्या सोचेगा वो, कितनी ‘फॉरवर्ड’ लड़की है।’ मन में चाहे जो भी उथल-पुथल हो रही हो, मैं लिखा करती कि ‘आज क्लास में Wheatstone Bridge Formula या Avogadro’s Hypothesis या Homologus Series पढ़ा रहे थे मुझे समझ नहीं आया। तुम समझाओगे क्या?’ उन्हे भी एक विषय मिल जाता। पन्ने भर-भर के explain करते। ज़्यादा समझ नहीं आता क्योंकि सब अंग्रेजी में होता था! मैं उनकी ‘हैन्डराइटिंग’ और अंग्रेज़ी की कायल हो गई! उनकी चिट्ठियाँ फिज़िक्स और केमेस्ट्री के ट्यूटोरियल मटेरियल्स सी होतीं थीं।
इस बीच स्कूल की फ़ेयरवेल पार्टी हुई। उन दिनों स्कूल-कॉलेज की फ़ेयरवेल पार्टीज़ में, दफ़्तरों में, गली-मुहल्लों में होली के समय ‘बुरा ना मानो होली है’ के नाम पर ‘टाइटल्स’ देने की प्रथा थी। बड़े क्रिएटिव ढंग से कुछ पंक्तियों में ही किसी के व्यक्तिव, चरित्र और व्यवहार का आँकलन हो जाता था। वो इतना सटीक होता कि नाम न लिखा हो तो भी समझ आ जाता कि किसके लिए लिखा गया है! मुझे टाइटल मिली-
बाद-ए-मुरदन के मेरी कब्र पे बोना चने-आलू,
ताकि लोग भी समझे कोई चाट के शौकीन भी थे!!
यह मेरा पहला exposure था ग़ज़लनुमा अभिव्यक्ति का। वैसे तो घर में कबीर, रहीम, रसखान, तुलसी, मीरा खूब पढ़े, सुने और सुनाए जाते थे। आई महादेवी, नीरज, निराला, भारती, दिनकर, शिवानी, गुलशन नंदा, शरतचंद्र, टैगोर, विनोद कुमार शुक्ल और अन्य लेखकों को पढ़ती थीं। हम हिन्दी मीडियम वालों के कोर्स में भी अच्छा साहित्य होता था मगर वो सब परीक्षा के नज़रियों से पढ़ा जाता था।
घर में धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वातावरण था। मेरे एक चाचा कविता नाटक लिखते थे और दूसरे आचार्य विनोबा भावे के साथ पत्राचार में आध्यात्मिक चर्चा करते थे। दादाजी बाँसुरी और हारमोनियम बजाते थे। सब केवल स्वांतः सुखाय वाला मामला था। कुल मिलाकर बच्चों में कला और साहित्य को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण था। घर और स्कूल में अच्छे साहित्य के exposure के बावजूद लेखन की तरफ़ रुचि नहीं हुई।
शायद जब किसी बहुत बड़े व्यक्ति का आभा मण्डल हमारी पहुँच से बाहर होता है तो हम उनके प्रभाव और भक्ति भाव में ही सीमित रह जाते हैं। इसलिए प्रभावित तो हुई मगर लेखन की प्रेरणा मुझे इस ‘टाइटल’ से मिली। जैसे किसी ने उकसा दिया हो कि ऐसा ‘कुछ’ भी लिखा जा सकता है, ये भी रचनात्मकता है और ऐसा तो मैं भी लिख सकती हूँ अपना, ओरिजनल।’
धीरे-धीरे ख़ुद को और अपने आस-पास की चीजों को देखने, महसूसने का अंदाज़ बदलने लगा। जब हवा से बाल चेहरे पे आ जाते थे तो पहले झट से खींचकर कान के पीछे ठूँस देती थी लेकिन अब उसे चेहरे पे ही महसूस करने का मन करता। बारीश की बूंदों को, बादल को, इंद्रधनुष को, फूलों को और पक्षियों को गौर से देखती... और देर तक कुछ-कुछ सोचा करती। अलग से विचार आते थे। जैसे भगवान भी ख़ुद नए-नए रूप में मुझको लुभा रहा है, क्योंकि उसको मुझसे प्यार हो गया है!
घर में जब अपने इन भावों को साझा करती सब ख़ुश होते कि मेरा दिमाग सही दिशा में चल रहा है! देश प्रेम, मानवता प्रेम परिवार से प्रेम सब ठीक है मगर एक लड़के और लड़की के बीच होने वाले सहज स्वाभाविक प्रेम को चरित्र से जोड़ दिया जाता था। पूरी दुनिया से प्रेम करो मगर किसी लड़के से नहीं। भई, मुझे तो होने लगा था! प्रेम के साथ-साथ कविता का अंकुरण भी हुआ। मेरे मन की नई तरंगों की पहली अभिव्यक्ति कविता ही थी।
"A silly original is better than a good duplicate — दादा की यह बात मन में घर कर गई।"
जो मन में आता, भाता लिखती। स्कूल के निबंधों में खुद के ही विचार लिखा करती। कभी ठीक-ठाक तो कभी ऊटपटाँग। दादा बोलते नंबर की चिंता मत करो बस अच्छी किताबें पढ़ो, अच्छी बातें सुनो। उससे अच्छे विचार आएँगे। अच्छे विचार आएँगे तो अच्छा लिखोगी। जो लिखो अपने ढंग से लिखो और याद रखो कि ‘A silly original is better than a good duplicate’ ये बात मन में घर कर गई.
मगर मेरे silly original का पहला शिकार बने मेरे भाई, बहन और सहेली सविता। घर में एक कवि का प्राकट्य घर वालों की सहनशक्ति का परीक्षण और प्रशिक्षण दोनों होता है! अब मन इन्हीं सब में लगने लगा था। बाकी सारे विषय तो थोपे हुए लगते थे।
ये वो साल था जब आभास एनसीसी में बेस्ट कडेट चुनकर ‘इंडो कनाडा वर्ल्ड यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम’ में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए कनाडा जाने वाले थे। जाने के पहले वे मुझसे मिलने आए- जमशेदपुर से रायपुर। ‘मुझसे’ मिलने एक लड़का ट्रेन में बारह घंटे का सफर करके आ रहा है यही अपने आप में एक प्रमाण था कि मैं उसके लिए बहुत ‘स्पेशल’ हूँ। एक अबोला आश्वासन था। घुटनों पर बैठकर फूल देकर प्रपोज करने का चलन हमारी जानकारी में तो था ही नहीं।
आने के पहले वाली चिट्ठी में लिखा, ‘एकेले मत आना! हाम लोग होटल में एकेले मिलेगा, लोगों को आच्छा नहीं लागेगा।’ मैंने भी स्कूल के बस्ते में अपनी सबसे अच्छी ड्रेस रख ली। रास्ते में ‘मंजु ममता’ रेस्टोरेंट के बाथरूम में जाकर बदली और अपने भाई संजू और बहन राजू के साथ होटल पहुँच गई। दूसरे दिन जब वो वापस जाने लगे तो ऐसा लगा जैसे कुछ छूटा जा रहा है। फिर तो न खाने का मन करता ना खेलने का, पढ़ने का तो बिल्कुल भी नहीं! ऊपर से बोर्ड की परीक्षाएँ सर पर थीं।
इस बीच ‘होली’ आई। आस अड़ोस-पड़ोस के लड़कों को भी इधर-उधर से शायद मेरे हाव-भाव, बर्ताव से मेरे ‘चक्कर’ का पता चल गया था। यह मुझे तब मालूम हुआ जब मुहल्ले में टाइटल मिली-
कौन कहता है मुहब्बत की जुबां होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयां होती है
बस उसके बाद तो जगजीत सिंह जी की ये ग़ज़ल तो मेरी हो गई और साथ ही जगजीत सिंह भी मेरे हो गए। उनकी आवाज़ भगवान की आवाज़ लगती थी जो मेरे मन की सारी बातें जानती थी। ‘टू इन वन’ पर दिन भर कैसेट लगा-लगाकर सुना करती थी। जगजीत सिंह एक चस्का है लग गया तो जीवन भर नहीं जाता। उन दिनों कोई सोशल मीडिया नहीं था मगर जगजीत सिंह को सुनना मतलब खुले आम ऐलान था ‘In Relationship’!
जब किस्मत ने मौका दिया जगजीत सिंह जी से आत्मीय मुलाक़ात तो मैंने उनको बताया कि उन्होंने किस तरह हमारे प्यार को पनपने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी तो उन्होंने जवाब में कहा, ‘चलो एक हैप्पी-हैप्पी वाला जोड़ा तो मिला वरना मुझे लगता था कि मुझे तो दिलजले ही सुनते हैं।’
परीक्षा के साथ PMT की तैयारी भी करनी थी। मगर ग़ज़ल दिमाग में गूँजती रहती। तुमको देखा तो ये खयाल आया, ज़िंदगी धूप तुम घना छाया... सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं, लेकिन ये सोचता हूँ कि तेरा क्या हूँ मैं... सोचती। वाह ये तो बहुत आसान है... बस धुन सवार हो गई ग़ज़ल लिखने की। लगा ग़ज़ल के लिए तो उर्दू सीखनी पड़ेगी। लेकिन कैसे? कहाँ? ताक और तलाश में रहने लगी।
स्कूल के रास्ते में ‘बूढ़ा तालाब’ पड़ता था जिसके पास ही ‘क़िले वाले बाबा’ की मज़ार थी। एक दिन मैंने देखा कि मज़ार के बाहर चबूतरे पर बैठकर एक बुज़ुर्ग सज्जन उर्दू अख़बार पढ़ रहे हैं। मैंने झटके से अपनी साइकिल रोकी और उनके पास जाकर बड़े अदब से बोली, ‘चचाजान, आप मुझे उर्दू सिखाएँगे?’ उन्होंने मुझसे दो चार सवाल पूछे फिर मेरी लगन देखकर उन्होंने हामी भर दी। मैं रोज़ स्कूल से लौटते उसी चबूतरे पर बैठकर उनसे उर्दू सीखती। एक-डेढ़ महीने में उर्दू लिखना-पढ़ना आ गया। घर में किसी को कानों कान ख़बर नहीं थी। सबको लगता बोर्ड की एक्स्ट्रा क्लाससेस की वजह से देर हो जाती है! अब सोचती हूँ तो यक़ीन नहीं होता कि ये सब भी कर लिया मैंने!
एक वादविवाद प्रतियोगिता हुई जिसमें मुझे हमारी स्कूल से एक कॉनवेंट स्कूल भेजा गया वहाँ अंग्रेज़ी मीडियम वालों के आत्मविश्वास और रौब देखकर फिर से माथा ठनका! ठान लिया कि अंग्रेज़ी सीखना है, चाहे जो हो जाए। अंग्रेज़ी कमज़ोर होने का कॉम्प्लेक्स हमारे समय में अच्छे-अच्छे होनहार लोगों को हीन भावना से ग्रस्त कर देता था। बस लग गई मैं अंग्रेज़ी सीखने में! जगजीत सिंह के गाने सुनते-सुनते पूरी पढ़ाई करती थी। बोर्ड के पेपर का फ़ॉर्म भरते समय मैंने माध्यम के कॉलम में ‘अंग्रेज़ी’ भर दिया।
प्री बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया- कहाँ तो फर्स्ट-10 में आती थी और कहाँ पास होने के लाले पड़ रहे थे। गणित में तो पहले ही बन्ठादार था मगर फिज़िक्स, केमेस्ट्री बायलॉजी अच्छे थे मगर उसमें भी शर्मनाक नंबर आए। आई ने कान मरोड़ते हुए कहा, ‘अब जगजीत सिंह को कहना वही परीक्षा में बैठेंगे तुम्हारे बदले!!’
मैं डॉक्टर बनना चाहती थी मगर किस्मत को मंज़ूर नहीं था तभी तो फाइनल प्रैक्टिकल एग्ज़ाम में अजीब-अजीब सी घटनाएँ घटीं। केमेस्ट्री वाले दिन रास्ते में एक स्कूटर के सामने साइकिल लहराते हुए ऐसे निकली कि वो सज्जन गिर पड़े। मैं उठाने गई तो वे मेरी यूनिफॉर्म से समझ गए कि मैं ‘दानी स्कूल’ की छात्रा हूँ। उन्होंने कुछ नहीं कहा। स्कूल पहुँची तो पता चला कि वे केमिस्ट्री वाली मैडम के पतिदेव थे और हमारा वाईवा लेने आए थे! केमिस्ट्री टीचर से मेरी केमिस्ट्री ही बिगड़ गई।
रही सही कसर बायोलॉजी के प्रैक्टिकल वाले दिन पूरी हो गई जब हड़बड़ी में मैंने एक बड़े से मेंढक को आधी बेहोशी हालत में डिसेक्ट करने के लिए जैसे ही ट्रे में लेटाया मेंढक को होश आ गया! उस मेंढक ने उछल-उछल के ऐसा हंगामा किया कि पूरी क्लास के होश उड़ गए!! पीएमटी में तो selection नहीं हुआ। B Sc करने लगी।
NCC जॉइन कर लिया। मध्यप्रदेश की बेस्ट कडेट बनी, दिल्ली की गणतंत्र दिवस परेड में अपने राज्य का प्रतिनिधित्व किया। लेखन थोड़ा-बहुत चलता रहा। बहन रंगमंच किया करती थी, मैं नाटकों का संचालन करती और अखबारों के लिए उनकी समीक्षाएं लिखती। समीक्षाएं भी छपतीं। लोग प्रशंसा से ज़्यादा आश्चर्य करते कि हुआ क्या है इसे!! ये हवा में रहने वाली लड़की लेखन की गहराई में कहाँ पहुँच गई!
आभास का कॅम्पस से फरीदाबाद में जॉब लग गया। मेरे graduation का आख़री साल था लेकिन बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में घर से भागकर फरीदाबाद कोर्ट में शादी हुई। ये कहानी फिर सही! उसके लिए एक अलग किताब लिखनी पड़ेगी।
उन दिनों हम भोपाल में थे। शादी के 10 साल के अंदर हम बेटों के पेरेंट्स बन गए थे। मैंने अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया। पहले स्कूल में फिर कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़ाई। जीवन सीधा-सादा सुखद चल रहा था।
एक दिन वो हुआ जो कल्पना से परे था। मंजुल प्रकाशन के विकास रखेजा जो मेरे मित्र और भास्कर परिवार से संबंधित हैं, ने कहा, ‘जगजीत सिंह जी का कॉन्सर्ट है तुम एंकरिंग करोगी?’ ये सुन कर मैं ‘सुन्न’ पड़ गई। यहाँ तक तो ठीक था मगर किस्मत ने ऐसा ज़ोर मारा कि भास्कर की तरफ से मैं उनकी होस्ट बन गई। 2 दिन बिताने का मौका मिला। जैसे जगजीत नाम का जैक्पाट लग गया हो।
विकास ने उनको बताया कि मैं लिखती हूँ तो उन्होंने कहा, ‘भई कुछ सुनाओ’
मैंने झिझकते हुआ कहा, ‘डायरी नहीं है अभी तो...’
‘ओह, कोई बात नहीं कल याद से ले आना। बेटों को कहाँ छोड़ के आती हो?
‘घर पर ही। बाहर से लॉक कर देती हूँ। दोनों आराम से खेलते रहते हैं। खाने पीने की व्यवस्था कर देती हूँ।’
‘अरे कमाल की माँ हो भई, बच्चों को लॉक करके कोई आता है क्या! कल साथ ले आना।’
उन्हे एक महान कलाकार की हैसियत से तो जानती थी मगर उस दिन एक अद्भुत इंसान को भी जाना! दूसरे दिन बच्चों को हज़ारों हिदायतें देकर अपने साथ लेकर गई और डायरी भी मगर हिम्मत नहीं हो रही थी उनको बताने की। बच्चों के साथ थोड़ी देर खेलते रहे फिर अचानक कहा, ‘डायरी है ना आज? सुनाओ कुछ’ मैंने सुनाया। उन्होंने बड़ी दिलचस्पी लेते हुए कहा, ‘लाओ इधर।’ फिर पन्ने पलटते हुए बोले, ‘लिखती तो अच्छा हो, अब एक काम करो डॉ बशीर बद्र तो भोपाल के हैं। तुम उनसे ये वाली ग़ज़ल इस्सेलाह करवा लो। फिर मुझे भेज दो। थोड़ा मीटर का मसला है बस। डॉ साहब ठीक कर देंगे। ‘मरासिम’ के लॉन्च के बाद मैं नई गज़लों का एक एलबम बनाने वाला हूँ उसपे ये वाली ग़ज़ल जमेगी।’
फ़ासले कुछ अपने बीच रहने दो ज़रा, फिर से मिलें, ये ख़्वाहिश रहने दो ज़रा
बेकार होता है यूँ भी ठहरा हुआ पानी, बहता है जो आँखों से तो बहने दो ज़रा
शोर तो कह लेता है अपनी दास्ताँ अब खामोशी को भी तो कहने दो ज़रा
उन्होंने मेरी उस डायरी में अपना पता लिखा और घर का नंबर भी। ‘जब मुंबई आओ तो घर ज़रूर आना। चिंटू-मिंटू’ को मत भूलना।’ उन्होंने ख़ुद डॉ बशीर बद्र से मेरे बारे में बात की।
एक दिन डॉक्टर साहब का फोन आ गया और यह तय हुआ कि वे मुझसे मिलने मेरे घर आएंगे। एक लाल बत्ती वाली गाड़ी रुकी डॉ बशीर बद्र अपने मित्र व लोकप्रिय शाइर इन्स्पेक्टर जनरल विजय वाते जी के साथ घर आ गए। उस दिन दो नए रिश्ते बने- विजय वाते जी मेरे बड़े भाई विजय दादा बन गए और डॉक्टर साहब मेरे उस्ताद। (उन्होंने मुझे माना या नहीं ये नहीं मालूम)
विजय दादा की किताब ‘ग़ज़ल’ का लॉन्च गुलज़ार साहब करने वाले थे। उस कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर बशीर बद्र के साथ मैनें किया! किताब की कुछ ग़ज़लें विशाल भारद्वाज ने कम्पोज़ की थीं और उस कार्यक्रम में गाईं भी। मेरे लिए वह सबसे बड़ा मंच था। सामने गुलज़ार साहब बैठे थे, साथ में डॉक्टर बशीर बद्र थे, मंच पर विशाल भारद्वाज थे और IG विजय दादा की किताब का लोकार्पण हो रहा था!
एक दिन विजय दादा घर आए। ‘ may be डॉ साहब ने कहा है मैं तुम्हें ज़रा हेल्प कर दूँ ये कुछ बह्र हैं।’ उन्होंने कुछ पन्ने मेरे हाथों में रखे। उसे देखकर ग़ज़ल कहने का भूत ही भाग गया। जिसे आसान समझ रही थी वो रॉकेट साइंस लगने लगा! मीटर, बह्र, वज़न, क़ाफ़िया, रदीफ़, इज़ाफ़त, तक्तिअ मात्राओं का गिरना। फ़ाईलातुन फ़ाईलुन मुफ़ाइलुन मुस्तफ़्यलून... ये सब पढ़कर तो बुखार आ गया! मैंने कभी जगजीत सिंह जी को फोन नहीं किया ना चिट्ठी लिखी। क्या लिखती?
फिर किस्मत पहले बैंगलोर फिर UAE लेकर चली गई। मैंने बंगलौर जाकर NIFT से Export Management कर लिया था। Corporates में काम करना शुरू हो गया। जब समय मिलता अपने अनुभवों को लिखती कभी कविताओं में, कभी लेखों में। हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं में लिखने लगी थी। ऐसे ही अपने ससुर जी (बाबू) की सर्जरी के समय के अनुभव को लिखा। मेरे बेटे ने पढ़ा और Gulf News में भेज दिया। 4 घंटे के भीतर उनके दुबई ऑफिस से फोन आया “हम आपके लेख को अपने एक विशेषांक में छापना चाहते हैं आपके पूरे परिवार के साथ आपका फोटो शूट करना चाहते हैं।’
वो आर्टिकल छपा एक स्पेशल-स्टोरी बनकर। ग्लोबल community के बड़े-बड़े विद्वानों की नज़र मुझपे पड़ी। यह फायदा हुआ अंग्रेज़ी लेखन का! एक मिस्री विद्वान थे- 70 वर्षीय डॉक्टर एज़दिन इब्राहीम मुस्तफा। वे UAE के Founder President शेख ज़ायद के मित्र, Cultural Advisor तथा Al Ain University के पहले Vice-Chancellor थे, उन्होंने Gulf News के Editor को मेरे लेख की प्रशंसा में एक पत्र लिखा। इतनी बड़ी शख्सियत के एक पत्र ने मेरी पात्रता को ऐसा आयाम दिया कि इस लेख के बारे में संपादकीय लिखा गया। ये ग्लोबल boundries पार करता हुआ कहाँ-कहाँ छपने लगा मुझे भी नहीं मालूम। उन्होंने मेरा फोन नंबर लेकर मुझे फोन किया और कहा, “I am like your father. Will you call me Babu?” वे एक दिन मेरे घर आ गए। उस दिन से एक पराया देश मेरा पीहर हो गया!
मैंने तय कर लिया कि मुझे केवल लिखना है। दुबई में अंग्रेज़ी लेखिका के रूप में मेरी पहचान बन गई। पंद्रह साल बाद भारत वापस लौटे। मैंने लेखन को अपना full-time काम बना लिया। जागरण ग्रुप के लिए कॉफी टेबल बुक लिखने का काम मिल गया। अमूल इडिया के लिए डाक्यूमेंट्री फिल्म्स लिखीं। मेरी एक कविता पर अमूल इंडिया ने एक promotional फिल्म भी बनाई। हिन्दी नाटकों की किताब लिखी ‘दो नाटक’। इस किताब को वर्ष 2024 का मध्यप्रदेश साहित्य अकादेमी अवॉर्ड मिला है।
अवार्ड्स प्रसन्न और प्रोत्साहित तो करते हैं साथ ही बेहतर और ज़िम्मेदारी से लिखने का प्रेशर भी देते हैं। Lockdown के समय मैंने भी अपनी कविता का एक विडिओ बनाया और यूट्यूब पर डाल दिया। वो इतना वाइरल हुआ कि श्रीमती स्मृति ईरानी तक पहुँच गया। एक के बाद एक विडिओ वाइरल होते चले गए। मेरी एक पहचान बन गई। नई ऊर्जा आई, उत्साह के साथ महत्वाकांक्षा भी बढ़ रही थी। अच्छा लगने लगा। कविताओं की वजह से जाने कहाँ कहाँ अनोखे और अनमोल रिश्ते बन जाते हैं। हर बार अभिभूत और चमत्कृत होती हूँ।
अब मैं आश्वस्त हूँ और आशावान भी कि हिन्दी कविता को सुनने वाले पूरी दुनिया में कम हो जाएं मगर खत्म नहीं होंगे। अपने सुनने/पढ़ने वालों का हिन्दी कविता के प्रशंसकों का ऋण है मुझपे। यह किताब उसी ऋण की पहली किश्त है...